कर्पूरं मध्यमान्त्यस्वरपरिरहितं सेन्दुवामाक्षियुक्तं
बीजं ते मातरेतत्त्रिपुरहरवधु त्रिःकृतं ये जपन्ति ।
तेषां गद्यानि पद्यानि च मुखकुहरादुल्लसन्त्येव वाचः
स्वच्छन्दं ध्वान्तधाराधररुचिरुचिरे सर्वसिद्धिं गतानाम् ॥१॥
karpūraṃ madhyamāntyasvaraparirahitaṃ sendu-vāmākṣi-yuktaṃ |
bījaṃ te mātar etat tripura-hara-vadhu triḥkṛtaṃ ye japanti |
teṣāṃ gadyāni padyāni ca mukha-kuhārād ullasanty eva vācaḥ |
svacchandaṃ dhvānta-dhārā-dhara-ruci-rucire sarva-siddhiṃ gatānām ||1||
śārdūlavikrīḍita
हे माता, हे त्रिपुरारि शिव की वधू! जो साधक तेरे इस बीज-मन्त्र को — कर्पूर (क्रं) से मध्य और अन्त्य स्वरों को हटाकर, अर्धचन्द्र और वाम-नेत्र (बिन्दु एवं ई) से युक्त करके — तीन बार जपते हैं, हे साँझ के मेघ-समान श्यामल कान्ति वाली, उनके मुख-कुहर से गद्य और पद्य रूप में वाणी स्वच्छन्द बहती है और वे सब सिद्धियाँ प्राप्त कर लेते हैं।