The Essence of the Tantra· 9.39 / 53

The Essence of the Tantra9.39

9.39

एवं च पाञ्चदश्ये स्थिते यावत् स्फुटेदन्तात्मनो भेदस्य न्यूनता तावत् द्वयं द्वयं ह्रसति यावत् द्वितुटिकः शिवावेशः तत्र आद्या तुटिः सर्वतः पूर्णा द्वितीया सर्वज्ञानकरणाविष्टाभ्यस्यमाना सर्वज्ञत्वसर्वकर्तृत्वाय कल्पते न तु आद्या

Transliteration (IAST)

evaṃ ca pāñcadaśye sthite yāvat sphuṭedantātmano bhedasya nyūnatā tāvat dvayaṃ dvayaṃ hrasati yāvat dvituṭikaḥ śivāveśaḥ tatra ādyā tuṭiḥ sarvataḥ pūrṇā dvitīyā sarvajñānakaraṇāviṣṭābhyasyamānā sarvajñatvasarvakartṛtvāya kalpate na tu ādyā

— पाञ्चदश्य के स्थित होने पर ; — स्फुट इदन्ता-आत्मक (व्यक्त इदम्-भाव रूप) का ; — न्यूनता — कमी ; — दो-दो ह्रास होता है ; — द्वि-तुटिक — दो तुटियों वाला ; — शिव-आवेश ; — सर्वतः पूर्ण — हर ओर से पूर्ण ; — सर्वज्ञान-करणों से आविष्ट ; — अभ्यस्त होती हुई ; — सर्वज्ञत्व-सर्वकर्तृत्व के लिए ; — समर्थ होती है

और इस प्रकार पाञ्चदश्य के स्थित होने पर, जितनी स्फुट इदन्ता-आत्मक भेद की न्यूनता होती है, उतना दो-दो ह्रास होता है, जब तक द्वि-तुटिक शिव-आवेश (न हो जाये)। उसमें प्रथम तुटि सर्वतः पूर्ण है; द्वितीय सर्वज्ञान-करणों से आविष्ट, अभ्यस्त होती हुई सर्वज्ञत्व-सर्वकर्तृत्व के लिए समर्थ होती है, किन्तु प्रथम नहीं।