एवं च पाञ्चदश्ये स्थिते यावत् स्फुटेदन्तात्मनो भेदस्य न्यूनता तावत् द्वयं द्वयं ह्रसति यावत् द्वितुटिकः शिवावेशः तत्र आद्या तुटिः सर्वतः पूर्णा द्वितीया सर्वज्ञानकरणाविष्टाभ्यस्यमाना सर्वज्ञत्वसर्वकर्तृत्वाय कल्पते न तु आद्या
Transliteration (IAST)
evaṃ ca pāñcadaśye sthite yāvat sphuṭedantātmano bhedasya nyūnatā tāvat dvayaṃ dvayaṃ hrasati yāvat dvituṭikaḥ śivāveśaḥ tatra ādyā tuṭiḥ sarvataḥ pūrṇā dvitīyā sarvajñānakaraṇāviṣṭābhyasyamānā sarvajñatvasarvakartṛtvāya kalpate na tu ādyā
और इस प्रकार पाञ्चदश्य के स्थित होने पर, जितनी स्फुट इदन्ता-आत्मक भेद की न्यूनता होती है, उतना दो-दो ह्रास होता है, जब तक द्वि-तुटिक शिव-आवेश (न हो जाये)। उसमें प्रथम तुटि सर्वतः पूर्ण है; द्वितीय सर्वज्ञान-करणों से आविष्ट, अभ्यस्त होती हुई सर्वज्ञत्व-सर्वकर्तृत्व के लिए समर्थ होती है, किन्तु प्रथम नहीं।