The Essence of the Tantra· 9.38 / 53

The Essence of the Tantra9.38

9.38

लोकास् तु विकल्पविश्रान्त्या ताम् अहन्तामयीम् अहन्ताच्छादितेदम्भावविकल्पप्रसरां निर्विकल्पां विमर्शभुवम् अप्रकाशिताम् इव मन्यन्ते दुःखावस्थां सुखविश्रान्ता इव विकल्पनिर्ह्रासेन तु सा प्रकाशत एव इति इयम् असौ सम्बन्धे ग्राह्यग्राहकयोः सावधानता इति अभिनवगुप्तगुरवः

Transliteration (IAST)

lokās tu vikalpaviśrāntyā tām ahantāmayīm ahantācchāditedambhāvavikalpaprasarāṃ nirvikalpāṃ vimarśabhuvam aprakāśitām iva manyante duḥkhāvasthāṃ sukhaviśrāntā iva vikalpanirhrāsena tu sā prakāśata eva iti iyam asau sambandhe grāhyagrāhakayoḥ sāvadhānatā iti abhinavaguptaguravaḥ

— लोग, सांसारिक जन ; — विकल्प में विश्रान्ति के कारण ; — अहन्तामयी — अहन्ता से बनी ; — निर्विकल्प (भूमि) ; — विमर्श-भूमि — विमर्श की भूमि ; — मानो अप्रकाशित ; — मानते हैं ; — दुःख-अवस्था ; — सुख में विश्रान्त (जनों) के समान ; — विकल्प के निर्ह्रास (क्षय) से ; — प्रकाशित ही होती है ; — सावधानता — पूर्ण सजगता ; — अभिनवगुप्त गुरु (सम्मानार्थक बहुवचन)

किन्तु लोग विकल्प में विश्रान्ति के कारण उस अहन्तामयी, अहन्ता से आच्छादित इदम्-भाव के विकल्प के प्रसर वाली, निर्विकल्प विमर्श-भूमि को मानो अप्रकाशित — दुःख-अवस्था — मानते हैं, जैसे सुख में विश्रान्त (उसे ऐसा मानते हैं); किन्तु विकल्प के निर्ह्रास से वह प्रकाशित ही होती है। यह वही ग्राह्य-ग्राहक के सम्बन्ध में सावधानता है — ऐसा अभिनवगुप्त गुरु (कहते हैं)।