The Essence of the Tantra· 9.33 / 53

The Essence of the Tantra9.33

9.33

सौषुप्ते हि तत्त्वावेशवशाद् एव चित्रस्य स्वप्नस्य उदयः स्यात् गृहीतधराभिमानस् तु धरासकलः

Transliteration (IAST)

sauṣupte hi tattvāveśavaśād eva citrasya svapnasya udayaḥ syāt gṛhītadharābhimānas tu dharāsakalaḥ

— सुषुप्ति में ; — तत्त्व-आवेश के वश से ही ; — विचित्र स्वप्न का उदय ; — होता है ; — किन्तु जिसने धरा का अभिमान ग्रहण किया ; — धरा-सकल (धरा का सकल)

क्योंकि सुषुप्ति में तत्त्व-आवेश के वश से ही विचित्र स्वप्न का उदय होता है; किन्तु जिसने धरा का अभिमान ग्रहण किया है, वह धरा-सकल है।