The Essence of the Tantra· 9.20 / 53

The Essence of the Tantra9.20

9.20

सकलस्य तत्र प्रमातृतायोगेन तच्छक्तिशक्तिमदात्मनो भेदद्वयस्य प्रत्यस्तमयात् तथा च सकलस्य स्वरूपत्वम् एव केवलं प्रलयाकलस्य स्वरूपत्वे पञ्चानां प्रमातृत्वे एकादश भेदाः

Transliteration (IAST)

sakalasya tatra pramātṛtāyogena tacchaktiśaktimadātmano bhedadvayasya pratyastamayāt tathā ca sakalasya svarūpatvam eva kevalaṃ pralayākalasya svarūpatve pañcānāṃ pramātṛtve ekādaśa bhedāḥ

— सकल की ; — प्रमातृता के अभाव से ; — उसकी शक्ति एवं शक्तिमत्-रूप वाले ; — दो भेदों का ; — प्रत्यस्तमय (अस्त, लोप) के कारण ; — केवल स्वरूपत्व ही ; — प्रलयाकल के स्वरूपत्व में ; — पाँच के प्रमातृत्व में ; — ग्यारह भेद

वहाँ सकल की प्रमातृता न होने से उसकी शक्ति एवं शक्तिमत्-रूप दो भेदों का प्रत्यस्तमय (अस्त) हो जाता है; और इस प्रकार सकल का केवल स्वरूपत्व ही (रहता है)। प्रलयाकल के स्वरूपत्व में, पाँच के प्रमातृत्व में, ग्यारह भेद (होते हैं)।