The Essence of the Tantra· 8.91 / 93

The Essence of the Tantra8.91

8.91

गुणसमुदायमात्रं च पृथिवी नान्यो गुणी कश्चित्

Transliteration (IAST)

guṇasamudāyamātraṃ ca pṛthivī nānyo guṇī kaścit

— गुण-समुदाय-मात्र — केवल गुणों का समूह ; — पृथिवी ; — गुणी — गुणधारक द्रव्य (गुणों से अतिरिक्त)

और पृथिवी गुण-समुदाय-मात्र है; उनके अतिरिक्त कोई अन्य गुणी (गुणधारक द्रव्य) नहीं है।