श्रोत्रे तु शब्दजननसामर्थ्यविशिष्ट इति यावत् घ्राणे गन्धजननयोग्यतायुक्त इति भौतिकम् अपि न युक्तम् अहं शृणोमि इत्याद्यनुगमाच् च स्फुटम् आहङ्कारिकत्वम् करणत्वेन च अवश्यं कर्त्रंशस्पर्शित्वम् अन्यथा करणान्तरयोजनायाम् अनवस्थाद्यापातात्
Transliteration (IAST)
śrotre tu śabdajananasāmarthyaviśiṣṭa iti yāvat ghrāṇe gandhajananayogyatāyukta iti bhautikam api na yuktam ahaṃ śṛṇomi ityādyanugamāc ca sphuṭam āhaṅkārikatvam karaṇatvena ca avaśyaṃ kartraṃśasparśitvam anyathā karaṇāntarayojanāyām anavasthādyāpātāt
श्रोत्र (की उत्पत्ति) में वह शब्द-जनन के सामर्थ्य से विशिष्ट (होता है); घ्राण में गन्ध-जनन की योग्यता से युक्त — इस प्रकार। अतः (इन्द्रियों का) भौतिक (होना) भी युक्त नहीं; और 'मैं सुनता हूँ' इत्यादि के अनुगम से उनका आहङ्कारिकत्व (अहङ्कार से उत्पन्न होना) स्पष्ट है। और करण होने के कारण उनका कर्तृ-अंश से स्पर्शित्व अवश्य है, अन्यथा किसी अन्य करण से योजना करने पर अनवस्था आदि का प्रसंग आ जायेगा।