The Essence of the Tantra· 8.73 / 93

The Essence of the Tantra8.73

8.73

तत्र सात्त्विको यस्मात् मनश् च बुद्धीन्द्रियपञ्चकं च तत्र मनसि जन्ये सर्वतन्मात्रजननसामर्थ्ययुक्तः स जनकः

Transliteration (IAST)

tatra sāttviko yasmāt manaś ca buddhīndriyapañcakaṃ ca tatra manasi janye sarvatanmātrajananasāmarthyayuktaḥ sa janakaḥ

— सात्त्विक (अहङ्कार) ; — मन ; — पाँच बुद्धीन्द्रिय (ज्ञानेन्द्रिय) ; — जन्य (उत्पाद्य) मन के विषय में ; — समस्त तन्मात्रों को उत्पन्न करने के सामर्थ्य से युक्त ; — जनक — उत्पादक कारण

उनमें सात्त्विक (अहङ्कार) से मन तथा पाँच बुद्धीन्द्रिय (उत्पन्न होते हैं)। वहाँ जन्य (उत्पाद्य) मन के विषय में, समस्त तन्मात्रों को उत्पन्न करने के सामर्थ्य से युक्त वह (अहङ्कार) जनक है।