The Essence of the Tantra· 8.65 / 93

The Essence of the Tantra8.65

8.65

क्षोभः अवश्यम् एव अन्तराले अभ्युपगन्तव्य इति सिद्धं साङ्ख्यापरिदृष्टं पृथग्भूतं गुणतत्त्वम्

Transliteration (IAST)

kṣobhaḥ avaśyam eva antarāle abhyupagantavya iti siddhaṃ sāṅkhyāparidṛṣṭaṃ pṛthagbhūtaṃ guṇatattvam

— क्षोभ — संक्षोभ ; — अन्तराल में (प्रकृति एवं कार्यों के बीच) ; — स्वीकार करना चाहिए ; — सांख्य द्वारा अदृष्ट ; — पृथग्भूत — पृथक् (तत्त्व) ; — गुण-तत्त्व

क्षोभ को अन्तराल में अवश्य ही स्वीकार करना चाहिए — इस प्रकार सांख्य द्वारा अदृष्ट, पृथग्भूत गुण-तत्त्व सिद्ध है।