The Essence of the Tantra· 8.51 / 93

The Essence of the Tantra8.51

8.51

तृप्तस्य च अन्नादौ अवैराग्याभावे ऽपि अन्तःस्थरागानपायात्

Transliteration (IAST)

tṛptasya ca annādau avairāgyābhāve 'pi antaḥstharāgānapāyāt

— तृप्त (व्यक्ति) के ; — अन्न आदि के प्रति ; — अवैराग्य के अभाव होने पर भी (विरक्त होने पर भी) ; — अन्तःस्थ राग का अनपाय (निरन्तर बने रहना)

और तृप्त (व्यक्ति) के अन्न आदि में अवैराग्य के अभाव होने पर भी अन्तःस्थ राग का अनपाय (निरन्तरता) रहता है।