The Essence of the Tantra· 8.24 / 93

The Essence of the Tantra8.24

8.24

प्रलयकेवलस्य तु जृम्भमाण एव आस्त इति मलोपोद्बलितं कर्म संसारवैचित्र्यभोगे निमित्तम् इति तद्भोगवासनानुविद्धानाम् अणूनां भोगसिद्धये श्रीमान् अघोरेशः सृजति इति युक्तम् उक्तं मलस्य च प्रक्षोभ ईश्वरेच्छाबलाद् एव जडस्य स्वतः कुत्रचिद् अपि असामर्थ्यात्

Transliteration (IAST)

pralayakevalasya tu jṛmbhamāṇa eva āsta iti malopodbalitaṃ karma saṃsāravaicitryabhoge nimittam iti tadbhogavāsanānuviddhānām aṇūnāṃ bhogasiddhaye śrīmān aghoreśaḥ sṛjati iti yuktam uktaṃ malasya ca prakṣobha īśvarecchābalād eva jaḍasya svataḥ kutracid api asāmarthyāt

— प्रलयकेवल का (प्रलयाकल का) ; — जृम्भमाण — विस्तीर्ण, पूर्ण-क्रियाशील ; — मल से उपोद्बलित (पुष्ट) ; — संसार-वैचित्र्य के भोग में ; — निमित्त — कारण, हेतु ; — उस भोग-वासना से अनुविद्ध (अणुओं) का ; — अघोरेश (अशुद्ध अध्वा का सृष्टा) ; — प्रक्षोभ — संक्षोभ, उद्वेलन ; — जड (अचेतन मल) का ; — असामर्थ्य के कारण

किन्तु प्रलयकेवल का (मल) जृम्भमाण (पूर्ण क्रियाशील) ही रहता है; अतः मल से उपोद्बलित कर्म संसार-वैचित्र्य के भोग में निमित्त है। इसलिए उस भोग-वासना से अनुविद्ध अणुओं की भोग-सिद्धि के लिए श्रीमान् अघोरेश सृजित करता है — यह युक्त कहा गया। और मल का प्रक्षोभ ईश्वर-इच्छा के बल से ही (होता है), क्योंकि जड का स्वतः कहीं भी सामर्थ्य नहीं।