The Essence of the Tantra· 7.22 / 28

The Essence of the Tantra7.22

7.22

सा शक्तिर् व्याप्य यतो विश्वम् अध्वानम् अन्तर्बहिर् आस्ते तस्माद् व्यापिनी

Transliteration (IAST)

sā śaktir vyāpya yato viśvam adhvānam antarbahir āste tasmād vyāpinī

— वह शक्ति ; — व्याप्त कर के ; — समस्त अध्वा को (अभिव्यक्ति के मार्ग को) ; — अन्तर्-बहिर् (भीतर-बाहर) ; — स्थित रहती है ; — व्यापिनी (सर्वव्यापिनी)

वह शक्ति समस्त अध्वा को व्याप्त कर के अन्तर्-बहिर् (भीतर-बाहर) स्थित रहती है, अतः वह व्यापिनी (है)।