The Essence of the Tantra· 7.23 / 28

The Essence of the Tantra7.23

7.23

एवम् एतानि उत्तरोत्तरम् आवरणतया वर्तमानानि तत्त्वान्य् उत्तरं व्यापकं पूर्वं व्याप्यम् इति स्थित्या वर्तन्ते

Transliteration (IAST)

evam etāni uttarottaram āvaraṇatayā vartamānāni tattvāny uttaraṃ vyāpakaṃ pūrvaṃ vyāpyam iti sthityā vartante

— उत्तरोत्तर (आरोही क्रम में अधिकाधिक) ; — आवरण रूप से (आच्छादक कोश की भाँति) ; — वर्तमान रहते हुए ; — उत्तर (उच्चतर तत्त्व) ; — व्यापक — व्यापने वाला ; — व्याप्य — व्याप्त किया जाने वाला ; — स्थिति से, व्यवस्था में

इस प्रकार ये तत्त्व उत्तरोत्तर आवरण रूप से वर्तमान रहते हुए — उत्तर (उच्चतर) व्यापक तथा पूर्व (निम्नतर) व्याप्य — इस स्थिति से वर्तमान रहते हैं।