संविद्रूपस्यात्मनः प्राणशक्तिं पश्यन् रूपं तत्रगं चातिकालम् । साकं सृष्टिस्थेमसंहारचक्रैर् नित्योद्युक्तो भैरवीभावम् एति
Transliteration (IAST)
saṃvidrūpasyātmanaḥ prāṇaśaktiṃ paśyan rūpaṃ tatragaṃ cātikālam | sākaṃ sṛṣṭisthemasaṃhāracakrair nityodyukto bhairavībhāvam eti
संवित्-रूप आत्मा की प्राण-शक्ति को, तथा उसमें स्थित किन्तु काल से अतीत उसके रूप को, सृष्टि-स्थिति-संहार के चक्रों के साथ देखता हुआ, नित्य-उद्युक्त (सदा-सावधान साधक) भैरवी-भाव को प्राप्त होता है।