The Essence of the Tantra· 6.82 / 82

The Essence of the Tantra6.82

6.82

संविद्रूपस्यात्मनः प्राणशक्तिं पश्यन् रूपं तत्रगं चातिकालम् । साकं सृष्टिस्थेमसंहारचक्रैर् नित्योद्युक्तो भैरवीभावम् एति

Transliteration (IAST)

saṃvidrūpasyātmanaḥ prāṇaśaktiṃ paśyan rūpaṃ tatragaṃ cātikālam | sākaṃ sṛṣṭisthemasaṃhāracakrair nityodyukto bhairavībhāvam eti

— संवित्-रूप आत्मा की ; — प्राण-शक्ति को ; — देखता हुआ ; — रूप ; — तत्रग — उसमें स्थित ; — अतिकाल — काल से अतीत ; — सृष्टि-स्थिति-संहार के चक्रों के साथ ; — नित्य-उद्युक्त — सदा-सावधान, निरन्तर तत्पर ; — भैरवी-भाव को ; — प्राप्त होता है

संवित्-रूप आत्मा की प्राण-शक्ति को, तथा उसमें स्थित किन्तु काल से अतीत उसके रूप को, सृष्टि-स्थिति-संहार के चक्रों के साथ देखता हुआ, नित्य-उद्युक्त (सदा-सावधान साधक) भैरवी-भाव को प्राप्त होता है।