The Essence of the Tantra· 6.81 / 82

The Essence of the Tantra6.81

6.81

एवम् अखिलं कालाध्वानं प्राणोदय एव पश्यन् सृष्टिसंहारांश् च विचित्रान् निःसङ्ख्यान् तत्रैव आकलयन् आत्मन एव पारमेश्वर्यं प्रत्यभिजानन् मुक्त एव भवति इति

Transliteration (IAST)

evam akhilaṃ kālādhvānaṃ prāṇodaya eva paśyan sṛṣṭisaṃhārāṃś ca vicitrān niḥsaṅkhyān tatraiva ākalayan ātmana eva pārameśvaryaṃ pratyabhijānan mukta eva bhavati iti

— समस्त काल-अध्वा को ; — प्राण-उदय में ही ; — देखता हुआ ; — सृष्टि-संहारों को ; — विचित्र एवं असंख्य ; — आकलित करता हुआ, परिगणित करता हुआ ; — पारमेश्वरता — परमेश्वर की ईश्वरता ; — प्रत्यभिज्ञान करता हुआ (प्रत्यभिज्ञा-अर्थ में) ; — मुक्त

इस प्रकार समस्त काल-अध्वा को प्राण-उदय में ही देखता हुआ, तथा वहीं विचित्र, असंख्य सृष्टि-संहारों को आकलित करता हुआ, अपने ही आत्मा की पारमेश्वरता का प्रत्यभिज्ञान करता हुआ (साधक) मुक्त ही हो जाता है।