The Essence of the Tantra· 6.7 / 82

The Essence of the Tantra6.7

6.7

तत्र हृदयात् द्वादशान्तान्तं स्वाङ्गुलैः सर्वस्य षट्त्रिंशदङ्गुलः प्राणचारः निर्गमे प्रवेशे च स्वोचितबलयत्नदेहत्वात् सर्वस्य

Transliteration (IAST)

tatra hṛdayāt dvādaśāntāntaṃ svāṅgulaiḥ sarvasya ṣaṭtriṃśadaṅgulaḥ prāṇacāraḥ nirgame praveśe ca svocitabalayatnadehatvāt sarvasya

— हृदय से ; — द्वादशान्त-पर्यन्त (बारह अँगुल बाहर के बिन्दु तक) ; — अपनी अँगुलियों से (स्व-अँगुल माप से) ; — छत्तीस अँगुल का ; — प्राण-चार — प्राण की गति ; — निर्गम में (बाहर जाने में) ; — प्रवेश में (भीतर आने में) ; — अपने उचित बल-यत्न-देह के अनुरूप होने के कारण

उसमें हृदय से द्वादशान्त-पर्यन्त, अपनी अँगुलियों से सबका प्राण-चार निर्गम और प्रवेश में छत्तीस अँगुल का होता है, क्योंकि सबका अपने उचित बल-यत्न-देह के अनुरूप (माप) होता है।