The Essence of the Tantra· 5.39 / 43

The Essence of the Tantra5.39

5.39

वाच्यविरहेण संवित्स्पन्दाद् इन्द्वर्कगतिनिरोधाभ्याम्

Transliteration (IAST)

vācyaviraheṇa saṃvitspandād indvarkagatinirodhābhyām

— वाच्य (अर्थ) के विरह से ; — संवित्-स्पन्द से ; — इन्दु-अर्क (चन्द्र-सूर्य, दोनों श्वासों) की गति के निरोध से

वाच्य (अर्थ) के विरह से, संवित्-स्पन्द से, इन्दु-अर्क (चन्द्र-सूर्य अर्थात् दोनों श्वासों) की गति के निरोध से —