The Essence of the Tantra· 5.38 / 43

The Essence of the Tantra5.38

5.38

अन्तःस्पर्शद्विमर्शानन्तरसमुद्भूतं सितपीताद्यान्तरं वर्णम् उद्भाव्यमानं संविदम् अनुभावयति इति केचित्

Transliteration (IAST)

antaḥsparśadvimarśānantarasamudbhūtaṃ sitapītādyāntaraṃ varṇam udbhāvyamānaṃ saṃvidam anubhāvayati iti kecit

— अन्तःस्पर्श एवं विमर्श के अनन्तर समुद्भूत ; — सित-पीत आदि आन्तर (रंग) ; — उद्भावित किया जाता हुआ वर्ण (रंग) ; — संवित् का अनुभव कराता है ; — ऐसा कुछ (आचार्य कहते हैं)

अन्तःस्पर्श एवं विमर्श के अनन्तर समुद्भूत, सित-पीत आदि आन्तर वर्ण (रंग), उद्भावित किया जाता हुआ, संवित् का अनुभव कराता है — ऐसा कुछ (आचार्य कहते हैं)।