The Essence of the Tantra· 5.22 / 43

The Essence of the Tantra5.22

5.22

तत्र प्राग् आनन्दः पूर्णतांशस्पर्शात् तत उद्भवः क्षणं निःशरीरतायां रूढेः ततः कम्पः स्वबलाक्रान्तौ देहतादात्म्यशैथिल्यात् ततो निद्रा बहिर्मुखत्वविलयात्

Transliteration (IAST)

tatra prāg ānandaḥ pūrṇatāṃśasparśāt tata udbhavaḥ kṣaṇaṃ niḥśarīratāyāṃ rūḍheḥ tataḥ kampaḥ svabalākrāntau dehatādātmyaśaithilyāt tato nidrā bahirmukhatvavilayāt

— आनन्द (प्रथम अवस्था) ; — पूर्णता के अंश के स्पर्श से ; — उद्भव — उत्थान (द्वितीय अवस्था) ; — क्षण भर निःशरीरता में रूढ़ होने से ; — कम्प (तृतीय अवस्था) ; — स्व-बल से आक्रान्त होने पर ; — देह-तादात्म्य के शैथिल्य से ; — निद्रा (चतुर्थ अवस्था) ; — बहिर्मुखता के विलय से

उनमें पहले आनन्द — पूर्णता के अंश के स्पर्श से; फिर उद्भव — क्षण भर निःशरीरता में रूढ़ होने से; फिर कम्प — स्व-बल से आक्रान्त होने पर देह-तादात्म्य के शैथिल्य से; फिर निद्रा — बहिर्मुखता के विलय से;