The Essence of the Tantra· 5.21 / 43

The Essence of the Tantra5.21

5.21

तद् एव सृष्टिसंहारबीजोच्चारणरहस्यम् अनुसन्दधत् विकल्पं संस्कुर्यात् आसु च विश्रान्तिषु प्रत्येकं पञ्च अवस्था भवन्ति प्रवेशतारतम्यात्

Transliteration (IAST)

tad eva sṛṣṭisaṃhārabījoccāraṇarahasyam anusandadhat vikalpaṃ saṃskuryāt āsu ca viśrāntiṣu pratyekaṃ pañca avasthā bhavanti praveśatāratamyāt

— सृष्टि-संहार के बीज-उच्चारण का रहस्य ; — अनुसन्धान करता हुआ ; — विकल्प को संस्कृत करे ; — विश्रान्तियों में ; — पाँच अवस्थाएँ ; — प्रवेश की तरतमता के अनुसार

उसी सृष्टि-संहार के बीज-उच्चारण के रहस्य का अनुसन्धान करता हुआ (साधक) विकल्प को संस्कृत करे। और इन विश्रान्तियों में प्रत्येक में प्रवेश की तरतमता के अनुसार पाँच अवस्थाएँ होती हैं —