The Essence of the Tantra· 5.23 / 43

The Essence of the Tantra5.23

5.23

इत्थम् अनात्मनि आत्मभावे लीने स्वात्मनः सर्वमयत्वात् आत्मनि अनात्मभावो विलीयते इति अतो घूर्णिः महाव्याप्त्युदयात्

Transliteration (IAST)

ittham anātmani ātmabhāve līne svātmanaḥ sarvamayatvāt ātmani anātmabhāvo vilīyate iti ato ghūrṇiḥ mahāvyāptyudayāt

— अनात्म में आत्म-भाव के लीन हो जाने पर ; — अपने आत्मा के सर्वमय होने के कारण ; — आत्मा में अनात्म-भाव विलीन हो जाता है ; — घूर्णि — घुमरी, चक्रिल आवर्त (पञ्चम अवस्था) ; — महाव्याप्ति के उदय से

इस प्रकार अनात्म में आत्म-भाव के लीन हो जाने पर, अपने आत्मा के सर्वमय होने के कारण, आत्मा में अनात्म-भाव विलीन हो जाता है — अतः घूर्णि — महाव्याप्ति के उदय से।