The Essence of the Tantra· 5.17 / 43

The Essence of the Tantra5.17

5.17

तत्र प्राणम् उच्चिचारयिषुः पूर्वं हृदय एव शून्ये विश्राम्यति ततो बाह्ये प्राणोदयात् ततो ऽपि बाह्यं प्रति अपानचन्द्रापूरणेन सर्वात्मतां पश्यति ततः अन्यनिराकाङ्क्षो भवति ततः समानोदयात् सङ्घट्टविश्रान्तिम् अनुभवति तत उदानवह्न्युदये मातृमेयादिकलनां ग्रसते

Transliteration (IAST)

tatra prāṇam uccicārayiṣuḥ pūrvaṃ hṛdaya eva śūnye viśrāmyati tato bāhye prāṇodayāt tato 'pi bāhyaṃ prati apānacandrāpūraṇena sarvātmatāṃ paśyati tataḥ anyanirākāṅkṣo bhavati tataḥ samānodayāt saṅghaṭṭaviśrāntim anubhavati tata udānavahnyudaye mātṛmeyādikalanāṃ grasate

— प्राण का उच्चारण करने का इच्छुक ; — हृदय के शून्य में विश्राम करता है ; — प्राण (बहिर्गामी श्वास) के उदय से ; — अपान-चन्द्र के आपूरण से (अन्तर्गामी श्वास के भरने से) ; — सर्वात्मता — सबका आत्मा होने की दशा ; — अन्य की आकाङ्क्षा से रहित ; — समान (समानवायु) के उदय से ; — सङ्घट्ट (दोनों श्वासों के मिलन) की विश्रान्ति ; — उदान-वह्नि के उदय पर ; — मातृ-मेय आदि की कलना को ग्रसित कर लेता है

उसमें प्राण का उच्चारण करने का इच्छुक (साधक) पहले हृदय के शून्य में ही विश्राम करता है; फिर प्राण के उदय से बाह्य की ओर (जाता है); फिर बाह्य (बिन्दु) के प्रति अपान-चन्द्र के आपूरण से सर्वात्मता को देखता है; फिर अन्य की आकाङ्क्षा से रहित हो जाता है; फिर समान के उदय से सङ्घट्ट (मिलन) की विश्रान्ति का अनुभव करता है; फिर उदान-वह्नि के उदय से मातृ-मेय आदि की कलना (भेद-व्यापार) को ग्रसित कर लेता है।