The Essence of the Tantra· 5.18 / 43

The Essence of the Tantra5.18

5.18

तद्ग्रासकवह्निप्रशमे व्यानोदये सर्वावच्छेदवन्ध्यः स्फुरति

Transliteration (IAST)

tadgrāsakavahnipraśame vyānodaye sarvāvacchedavandhyaḥ sphurati

— उस ग्रासक वह्नि के प्रशम (शान्ति) पर ; — व्यान (व्यापक वायु) के उदय पर ; — समस्त अवच्छेद से रहित ; — स्फुरित होता है, स्फुरण करता है

उस ग्रासक वह्नि के प्रशम (शान्त होने) पर, व्यान के उदय से (साधक) समस्त अवच्छेद से रहित होकर स्फुरित होता है।