The Essence of the Tantra· 5.19 / 43

The Essence of the Tantra5.19

5.19

एवं शून्यात् प्रभृति व्यानान्तं या एता विश्रान्तयः ता एव निजानन्दो निरानन्दः परानन्दो ब्रह्मानन्दो महानन्दः चिदानन्द इति षट् आनन्दभूमय उपदिष्टाः यासाम् एकः अनुसन्धाता उदयास्तमयविहीनः अन्तर्विश्रान्तिपरमार्थरूपो जगदानन्दः

Transliteration (IAST)

evaṃ śūnyāt prabhṛti vyānāntaṃ yā etā viśrāntayaḥ tā eva nijānando nirānandaḥ parānando brahmānando mahānandaḥ cidānanda iti ṣaṭ ānandabhūmaya upadiṣṭāḥ yāsām ekaḥ anusandhātā udayāstamayavihīnaḥ antarviśrāntiparamārtharūpo jagadānandaḥ

— शून्य से लेकर व्यान-पर्यन्त ; — विश्रान्तियाँ ; — निजानन्द, निरानन्द, परानन्द ; — ब्रह्मानन्द, महानन्द, चिदानन्द ; — छह आनन्द-भूमियाँ ; — उपदिष्ट हैं ; — एक अनुसन्धाता (इनमें अनुस्यूत) ; — उदय-अस्त से विहीन ; — अन्तर्विश्रान्ति-परमार्थ-रूप ; — जगदानन्द — समस्त जगत् का आनन्द

इस प्रकार शून्य से लेकर व्यान-पर्यन्त जो ये विश्रान्तियाँ हैं, वे ही — निजानन्द, निरानन्द, परानन्द, ब्रह्मानन्द, महानन्द, चिदानन्द — ये छह आनन्द-भूमियाँ उपदिष्ट हैं; जिनका एक अनुसन्धाता, उदय-अस्त से विहीन, अन्तर्विश्रान्ति-परमार्थ-रूप, जगदानन्द है।