The Essence of the Tantra· 4.5 / 46

The Essence of the Tantra4.5

4.5

वैष्णवाद्या हि तावन्मात्र एव आगमे रागतत्त्वेन नियमिता इति न ऊर्ध्वदर्शने ऽपि तदुन्मुखतां भजन्ते ततः सत्तर्कसदागमसद्गुरूपदेशद्वेषिण एव

Transliteration (IAST)

vaiṣṇavādyā hi tāvanmātra eva āgame rāgatattvena niyamitā iti na ūrdhvadarśane 'pi tadunmukhatāṃ bhajante tataḥ sattarkasadāgamasadgurūpadeśadveṣiṇa eva

— वैष्णव आदि (निम्न मार्गों के अनुयायी) ; — उतने ही (सीमित) आगम में ; — राग-तत्त्व से (आसक्ति-तत्त्व से) ; — नियमित — बँधे हुए, परिसीमित ; — ऊर्ध्व-दर्शन में — उच्चतर दृष्टि/सिद्धान्त में ; — उसकी उन्मुखता — उसकी ओर अभिमुखता ; — सत्तर्क-सदागम-सद्गुरु-उपदेश के द्वेषी

क्योंकि वैष्णव आदि उतने ही (सीमित) आगम में राग-तत्त्व से नियमित (बँधे) हैं, अतः ऊर्ध्व-दर्शन में भी वे उसकी उन्मुखता नहीं भजते। इसलिए वे सत्तर्क, सदागम एवं सद्गुरु के उपदेश के द्वेषी ही हैं।