The Essence of the Tantra· 4.39 / 46

The Essence of the Tantra4.39

4.39

कलनं च गतिः क्षेपो ज्ञानं गणनं भोगीकरणं शब्दनं स्वात्मलयीकरणं च

Transliteration (IAST)

kalanaṃ ca gatiḥ kṣepo jñānaṃ gaṇanaṃ bhogīkaraṇaṃ śabdanaṃ svātmalayīkaraṇaṃ ca

— कलन — 'काली' का मूल अर्थ-व्यापार ; — गति — प्रेरणा, संचरण ; — क्षेप — प्रक्षेपण, फेंकना ; — ज्ञान, गणन — जानना, गिनना ; — भोगीकरण — भोग-विषय बनाना ; — शब्दन — नाम देना, ध्वनित करना ; — स्वात्म-लयीकरण — अपने आत्मा में विलीन करना

और 'कलन' है — गति, क्षेप, ज्ञान, गणन, भोगीकरण, शब्दन, तथा स्वात्म-लयीकरण।