The Essence of the Tantra· 4.35 / 46

The Essence of the Tantra4.35

4.35

एतत् त्रिविधं यया धारणम् आत्मन्य् एव क्रोडीकारेण अनुसन्धानात्मना ग्रसते सा अस्य भगवती श्रीपरैव श्रीमन्मातृसद्भावकालकर्षिण्यादिशब्दान्तरनिरुक्ता

Transliteration (IAST)

etat trividhaṃ yayā dhāraṇam ātmany eva kroḍīkāreṇa anusandhānātmanā grasate sā asya bhagavatī śrīparaiva śrīmanmātṛsadbhāvakālakarṣiṇyādiśabdāntaraniruktā

— इस त्रिविध धारण को ; — क्रोडीकार से — (अपने में) आलिंगित कर के ; — अनुसन्धान-रूप से — एकीकारी विमर्श रूप से ; — ग्रसित करती है, उपसंहृत करती है ; — भगवती श्रीपरा ही ; — श्रीमत् मातृसद्भाव, कालकर्षिणी आदि शब्दों से निरुक्त

और जिसके द्वारा वह इस त्रिविध धारण को आत्मा में ही क्रोडीकार (आलिंगन) द्वारा, अनुसन्धान-रूप से ग्रसित (विलीन) कर लेती है — वह उसकी भगवती श्रीपरा ही है, जो श्रीमत् मातृसद्भाव, कालकर्षिणी आदि अन्य शब्दों से निरुक्त है।