The Essence of the Tantra· 4.32 / 46

The Essence of the Tantra4.32

4.32

तिसृषु तावत् विश्वं समाप्यते यया इदं शिवादिधरण्यन्तम् अविकल्प्यसंविन्मात्ररूपतया बिभर्ति च पश्यति च भासयति च परमेश्वरः सा अस्य श्रीपरशक्तिः

Transliteration (IAST)

tisṛṣu tāvat viśvaṃ samāpyate yayā idaṃ śivādidharaṇyantam avikalpyasaṃvinmātrarūpatayā bibharti ca paśyati ca bhāsayati ca parameśvaraḥ sā asya śrīparaśaktiḥ

— तीन (शक्तियों) में ; — विश्व समाहित होता है ; — शिव से लेकर पृथ्वी-पर्यन्त ; — अविकल्प्य संविन्मात्र रूप से ; — धारण करता है, सहारा देता है ; — देखता है, अवलोकन करता है ; — भासित करता है, प्रकाशित करता है ; — श्रीपराशक्ति — परम शक्ति

अब विश्व तीन (शक्तियों) में समाप्त (समाहित) हो जाता है। जिसके द्वारा परमेश्वर शिव से लेकर पृथ्वी-पर्यन्त इस समस्त (विश्व) को अविकल्प्य संविन्मात्र रूप से धारण करता है, देखता है तथा भासित करता है — वह उसकी श्रीपराशक्ति है।