The Essence of the Tantra· 4.25 / 46

The Essence of the Tantra4.25

4.25

सर्वत्र सर्वदा निरुपायपरमेश्वराभिमानलाभाय परमेश्वरसमताभिमानेन देहस्यापि घटादेर् अपि अवलोकनं व्रतम्

Transliteration (IAST)

sarvatra sarvadā nirupāyaparameśvarābhimānalābhāya parameśvarasamatābhimānena dehasyāpi ghaṭāder api avalokanaṃ vratam

— निरुपाय परमेश्वर-अभिमान की प्राप्ति के लिए ; — परमेश्वर के साथ समता के अभिमान से ; — देह का तथा घट आदि का भी ; — अवलोकन — (इस दृष्टि से) देखना ; — व्रत

सर्वत्र, सर्वदा निरुपाय परमेश्वर-अभिमान की प्राप्ति के लिए परमेश्वर के साथ समता के अभिमान से देह का तथा घट आदि का भी अवलोकन (इस दृष्टि से देखना) व्रत है।