The Essence of the Tantra· 4.24 / 46

The Essence of the Tantra4.24

4.24

तथा उभयात्मकपरामर्शोदयार्थं बाह्याभ्यन्तरादिप्रमेयरूपभिन्नभावानपेक्षयैव एवंविधं तत् परं तत्त्वं स्वस्वभावभूतम् इति अन्तः परामर्शनं जपः

Transliteration (IAST)

tathā ubhayātmakaparāmarśodayārthaṃ bāhyābhyantarādiprameyarūpabhinnabhāvānapekṣayaiva evaṃvidhaṃ tat paraṃ tattvaṃ svasvabhāvabhūtam iti antaḥ parāmarśanaṃ japaḥ

— उभयात्मक (पर एवं विश्व) परामर्श के उदय के लिए ; — बाह्य-आभ्यन्तर आदि प्रमेय-रूप भिन्न भावों की अपेक्षा बिना ; — स्व-स्वभाव-भूत — अपना ही निज स्वभाव ; — अन्तःपरामर्शन — आन्तरिक विमर्श ; — जप — मानस आवृत्ति

इसी प्रकार उभयात्मक (पर तथा विश्व दोनों के) परामर्श के उदय के लिए, बाह्य-आभ्यन्तर आदि प्रमेय-रूप भिन्न भावों की अपेक्षा किये बिना ही 'इस प्रकार का वह परम तत्त्व मेरे ही स्व-स्वभाव-भूत है' — ऐसा अन्तःपरामर्श जप है।