The Essence of the Tantra· 4.23 / 46

The Essence of the Tantra4.23

4.23

सर्वे भावाः परमेश्वरतेजोमया इति रूढविकल्पप्राप्त्यै परमेशसंविदनलतेजसि समस्तभावग्रासरसिकताभिमते तत्तेजोमात्रावशेषत्वसहसमस्तभावविलापनं होमः

Transliteration (IAST)

sarve bhāvāḥ parameśvaratejomayā iti rūḍhavikalpaprāptyai parameśasaṃvidanalatejasi samastabhāvagrāsarasikatābhimate tattejomātrāvaśeṣatvasahasamastabhāvavilāpanaṃ homaḥ

— परमेश्वर के तेजोमय — उनके तेज से बने ; — रूढ़ विकल्प की प्राप्ति के लिए ; — परमेश-संवित्-रूप अग्नि के तेज में ; — समस्त भावों के ग्रास की रसिकता से अभिमत ; — उस तेज-मात्र के अवशेष रहने सहित समस्त भावों का विलापन ; — होम — आहुति

'समस्त भाव परमेश्वर के तेजोमय हैं' — इस रूढ़ विकल्प की प्राप्ति के लिए, समस्त भावों के ग्रास (भक्षण) की रसिकता से अभिमत परमेश्वर-संवित्-रूप अग्नि के तेज में, उस तेज-मात्र के अवशेष रहने के साथ समस्त भावों का विलापन (विलय) होम है।