The Essence of the Tantra· 4.26 / 46

The Essence of the Tantra4.26

4.26

यथोक्तं श्रीनन्दिशिखायाम् सर्वसाम्यं परं व्रतम् इति

Transliteration (IAST)

yathoktaṃ śrīnandiśikhāyām sarvasāmyaṃ paraṃ vratam iti

— श्रीनन्दिशिखा में (शास्त्र में) ; — सर्व-साम्य — सबके साथ समता ; — परम व्रत

जैसा कि श्रीनन्दिशिखा में कहा गया है — 'सर्व के साथ साम्य ही परम व्रत है।'