The Essence of the Tantra· 4.27 / 46

The Essence of the Tantra4.27

4.27

इत्थं विचित्रैः शुद्धविद्यांशरूपैः विकल्पैः यत् अनपेक्षितविकल्पं स्वाभाविकं परमार्थतत्त्वं प्रकाशते तस्यैव सनातनतथाविधप्रकाशमात्रतारूढये तत्स्वरूपानुसन्धानात्मा विकल्पविशेषो योगः

Transliteration (IAST)

itthaṃ vicitraiḥ śuddhavidyāṃśarūpaiḥ vikalpaiḥ yat anapekṣitavikalpaṃ svābhāvikaṃ paramārthatattvaṃ prakāśate tasyaiva sanātanatathāvidhaprakāśamātratārūḍhaye tatsvarūpānusandhānātmā vikalpaviśeṣo yogaḥ

— विचित्र — नाना प्रकार के ; — शुद्धविद्या के अंश-रूप ; — अनपेक्षित-विकल्प — (आगे) विकल्प की अपेक्षा न रखने वाला ; — स्वाभाविक — सहज, निज ; — सनातन उसी प्रकार की प्रकाश-मात्रता में रूढ़ि (स्थैर्य) के लिए ; — उसके स्वरूप के अनुसन्धान रूप ; — विकल्प-विशेष — विशिष्ट विकल्प ; — योग

इस प्रकार शुद्धविद्या के अंश-रूप विचित्र विकल्पों के द्वारा जब अनपेक्षित-विकल्प (विकल्प की अपेक्षा न रखने वाला), स्वाभाविक परमार्थ-तत्त्व प्रकाशित होता है, तब उसी की सनातन, उसी प्रकार की प्रकाश-मात्रता में रूढ़ि (स्थैर्य) के लिए उसके स्वरूप का अनुसन्धान करने वाला विकल्प-विशेष योग है।