The Essence of the Tantra· 4.13 / 46

The Essence of the Tantra4.13

4.13

न च अत्र सत्तर्कात् शुद्धविद्याप्रकाशरूपात् ऋते अन्यत् योगाङ्गं साक्षात् उपायः तपःप्रभृतेः नियमवर्गस्य अहिंसादेश् च यमप्रकारस्य पूरकादेः प्राणायामवर्गस्य वेद्यमात्रनिष्ठत्वेन क इव संविदि व्यापारः

Transliteration (IAST)

na ca atra sattarkāt śuddhavidyāprakāśarūpāt ṛte anyat yogāṅgaṃ sākṣāt upāyaḥ tapaḥprabhṛteḥ niyamavargasya ahiṃsādeś ca yamaprakārasya pūrakādeḥ prāṇāyāmavargasya vedyamātraniṣṭhatvena ka iva saṃvidi vyāpāraḥ

— सत्तर्क के अतिरिक्त ; — शुद्धविद्या के प्रकाश-रूप ; — योगांग — योग का अंग ; — साक्षात् उपाय — प्रत्यक्ष साधन ; — नियम-वर्ग का (तप आदि) ; — यम-प्रकार का (अहिंसा आदि) ; — प्राणायाम-वर्ग का (पूरक आदि) ; — केवल वेद्य (ज्ञेय) में निष्ठ होने के कारण ; — संवित् में व्यापार

और यहाँ शुद्धविद्या के प्रकाश-रूप सत्तर्क के अतिरिक्त अन्य कोई योगांग साक्षात् उपाय नहीं है। तप आदि नियम-वर्ग, अहिंसा आदि यम-प्रकार, तथा पूरक आदि प्राणायाम-वर्ग — ये सब केवल वेद्य (ज्ञेय) में निष्ठ होने के कारण संवित् में इनका क्या व्यापार हो सकता है?