The Essence of the Tantra· 4.14 / 46

The Essence of the Tantra4.14

4.14

प्रत्याहारो ऽपि करणभूमिम् एव सातिशयां कुर्यात् ध्यानधारणासमाधयो ऽपि यथोत्तरम् अभ्यासक्रमेण निर्वर्त्यमाना ध्येयवस्तुतादात्म्यं ध्यातुः वितरेयुः

Transliteration (IAST)

pratyāhāro 'pi karaṇabhūmim eva sātiśayāṃ kuryāt dhyānadhāraṇāsamādhayo 'pi yathottaram abhyāsakrameṇa nirvartyamānā dhyeyavastutādātmyaṃ dhyātuḥ vitareyuḥ

— प्रत्याहार — इन्द्रिय-निरोध ; — करण-भूमि — इन्द्रिय-क्षेत्र ; — अतिशययुक्त — परिष्कृत, उत्कर्षयुक्त ; — ध्यान, धारणा एवं समाधि ; — उत्तरोत्तर — क्रमशः ऊँचे ; — अभ्यास-क्रम से ; — ध्येय-वस्तु के साथ तादात्म्य ; — ध्याता को ; — प्रदान कर सकते हैं

प्रत्याहार भी करण-भूमि (इन्द्रिय-क्षेत्र) को ही अतिशययुक्त (परिष्कृत) करेगा। ध्यान, धारणा एवं समाधि भी, उत्तरोत्तर अभ्यास-क्रम से सम्पन्न होते हुए, ध्याता को केवल ध्येय-वस्तु के साथ तादात्म्य ही प्रदान कर सकते हैं।