किं तु गुरोर् आगमनिरूपणे व्यापारः आगमस्य च निःशङ्कसजातीयतत्प्रबन्धप्रसवनिबन्धनसमुचितविकल्पोदये व्यापारः तथाविधविकल्पप्रबन्ध एव सत्तर्क इति उक्तः स एव च भावना भण्यते अस्फुटत्वात् भूतम् अपि अर्थम् अभूतम् इव स्फुटत्वापादनेन भाव्यते यया इति
Transliteration (IAST)
kiṃ tu guror āgamanirūpaṇe vyāpāraḥ āgamasya ca niḥśaṅkasajātīyatatprabandhaprasavanibandhanasamucitavikalpodaye vyāpāraḥ tathāvidhavikalpaprabandha eva sattarka iti uktaḥ sa eva ca bhāvanā bhaṇyate asphuṭatvāt bhūtam api artham abhūtam iva sphuṭatvāpādanena bhāvyate yayā iti
किन्तु गुरु का व्यापार आगम के निरूपण में है, और आगम का व्यापार निःशंक, सजातीय एवं सतत प्रबन्ध को जन्म देने में निमित्तभूत समुचित विकल्प के उदय में है। उस प्रकार के विकल्प-प्रबन्ध को ही सत्तर्क कहा गया है, और वही भावना कहलाता है, क्योंकि उसके द्वारा अस्फुट होने के कारण भूत (विद्यमान) अर्थ भी मानो अभूत हो — इस प्रकार स्फुटता की आपादना से भाव्यमान (साक्षात् अनुभूत) किया जाता है।