The Essence of the Tantra· 3.11 / 34

The Essence of the Tantra3.11

3.11

अत्र च प्राच्यं परामर्शत्रयं प्रकाशभागसारत्वात् सूर्यात्मकं चरमं परामर्शत्रयं विश्रान्तिस्वभावाह्लादप्राधान्यात् सोमात्मकम् इयति यावत् कर्मांशस्य अनुप्रवेशो नास्ति

Transliteration (IAST)

atra ca prācyaṃ parāmarśatrayaṃ prakāśabhāgasāratvāt sūryātmakaṃ caramaṃ parāmarśatrayaṃ viśrāntisvabhāvāhlādaprādhānyāt somātmakam iyati yāvat karmāṃśasya anupraveśo nāsti

— प्राच्य — पूर्ववर्ती, प्रथम ; — प्रकाश-भाग के सार होने के कारण ; — सूर्यात्मक — सूर्य-स्वरूप ; — चरम — अन्तिम ; — विश्रान्ति-स्वभाव आह्लाद की प्रधानता के कारण ; — सोमात्मक — चन्द्र-स्वरूप ; — यहाँ तक, इयत्पर्यन्त ; — कर्मांश का — क्रिया-अंश का ; — अनुप्रवेश — प्रवेश ; — नहीं है

और यहाँ पूर्ववर्ती परामर्श-त्रय प्रकाश-भाग प्रधान होने के कारण सूर्यात्मक है, तथा अन्तिम परामर्श-त्रय विश्रान्ति-स्वभाव आह्लाद की प्रधानता के कारण सोमात्मक है। यहाँ तक कर्मांश (क्रिया-अंश) का अनुप्रवेश नहीं है।