The Essence of the Tantra· 3.10 / 34

The Essence of the Tantra3.10

3.10

तत्र मुख्यास् तावत् तिस्रः परमेश्वरस्य शक्तयः अनुत्तरेच्छोन्मेष इति तद् एव परामर्शत्रयम् अ इ उ इति एतस्माद् एव त्रितयात् सर्वः शक्तिप्रपञ्चः चर्यते अनुत्तर एव हि विश्रान्तिर् आनन्दः इच्छायाम् एव विश्रान्तिः ईशनम् उन्मेष एव हि विश्रान्तिर् ऊर्मिः यः क्रियाशक्तेः प्रारम्भः तद् एव परामर्शत्रयम् आ ई ऊ इति

Transliteration (IAST)

tatra mukhyās tāvat tisraḥ parameśvarasya śaktayaḥ anuttarecchonmeṣa iti tad eva parāmarśatrayam a i u iti etasmād eva tritayāt sarvaḥ śaktiprapañcaḥ caryate anuttara eva hi viśrāntir ānandaḥ icchāyām eva viśrāntiḥ īśanam unmeṣa eva hi viśrāntir ūrmiḥ yaḥ kriyāśakteḥ prārambhaḥ tad eva parāmarśatrayam ā ī ū iti

— तीन मुख्य शक्तियाँ ; — अनुत्तर — अनुपम परम (वर्ण 'अ') ; — इच्छा — संकल्प-शक्ति (वर्ण 'इ') ; — उन्मेष — उद्घाटन/विकास (वर्ण 'उ') ; — परामर्श-त्रय — तीन विमर्श (अ, इ, उ) ; — शक्ति-प्रपञ्च — शक्तियों का समस्त विस्तार ; — प्रवर्तित होता है, प्रचलित होता है ; — विश्रान्ति — विश्राम, स्थिति ; — आनन्द (वर्ण 'आ') ; — ईशन — ईश्वरता (वर्ण 'ई') ; — ऊर्मि — तरंग (वर्ण 'ऊ'), क्रिया-शक्ति का उन्मेष ; — क्रिया-शक्ति का प्रारम्भ

इनमें परमेश्वर की मुख्य शक्तियाँ तीन हैं — अनुत्तर, इच्छा और उन्मेष — यही 'अ इ उ' रूप परामर्श-त्रय है। इसी त्रय से समस्त शक्ति-प्रपञ्च प्रवर्तित होता है। अनुत्तर में ही विश्रान्ति आनन्द है; इच्छा में ही विश्रान्ति ईशन है; उन्मेष में ही विश्रान्ति ऊर्मि है, जो क्रिया-शक्ति का प्रारम्भ है — यही 'आ ई ऊ' रूप परामर्श-त्रय है।