The Essence of the Tantra· 3.9 / 34

The Essence of the Tantra3.9

3.9

स्वरूपानामर्शने हि वस्तुतो जडतैव स्यात् आमर्शश् च अयं न साकेतिकः अपि तु चित्स्वभावतामात्रनान्तरीयकः परनादगर्भ उक्तः स च यावान् विश्वव्यवस्थापकः परमेश्वरस्य शक्तिकलापः तावन्तम् आमृशति

Transliteration (IAST)

svarūpānāmarśane hi vastuto jaḍataiva syāt āmarśaś ca ayaṃ na sāketikaḥ api tu citsvabhāvatāmātranāntarīyakaḥ paranādagarbha uktaḥ sa ca yāvān viśvavyavasthāpakaḥ parameśvarasya śaktikalāpaḥ tāvantam āmṛśati

— स्वरूप का अनामर्शन होने पर ; — जडता — अचेतनता, जडत्व ; — आमर्श — (स्व-)विमर्श, बोधात्मक ग्रहण ; — सांकेतिक नहीं — कृत्रिम संकेत पर निर्भर नहीं ; — चित्-स्वभावता-मात्र के साथ अविनाभावी ; — परनाद-गर्भ — परम नाद को अन्तर्गर्भित किये हुए ; — विश्व-व्यवस्थापक — विश्व को स्थापित/नियन्त्रित करने वाला ; — शक्ति-कलाप — शक्तियों का समूह ; — उतना ही, तावत् ; — आमर्श करता है — बोध में ग्रहण करता है

क्योंकि स्वरूप का अनामर्शन होने पर वस्तुतः जडता ही हो जायेगी। और यह आमर्श (विमर्श) सांकेतिक (कृत्रिम संकेत-निर्भर) नहीं है, अपितु चित्-स्वभावता-मात्र के साथ अविनाभावी है, तथा परनाद-गर्भ कहा गया है। और वह उतने (समस्त) का आमर्श करता है, जितना परमेश्वर का विश्व-व्यवस्थापक शक्ति-कलाप (शक्ति-समूह) है।