शूलं समरसीकृत्य रसे रसम् इव स्थितम् । त्यक्ताशङ्को निराचारो नाहम् अस्मीति भावयन्
Transliteration (IAST)
śūlaṃ samarasīkṛtya rase rasam iva sthitam | tyaktāśaṅko nirācāro nāham asmīti bhāvayan
शूल को समरस करके, रस में रस के समान स्थित (होकर), शङ्का को त्यागकर, निराचार (आचार-रहित) होकर, 'मैं (परिमित अहं) नहीं हूँ' — ऐसा भावित करता हुआ,