The Essence of the Tantra· 22.44 / 53

The Essence of the Tantra22.44

22.44

शूलं समरसीकृत्य रसे रसम् इव स्थितम् । त्यक्ताशङ्को निराचारो नाहम् अस्मीति भावयन्

Transliteration (IAST)

śūlaṃ samarasīkṛtya rase rasam iva sthitam | tyaktāśaṅko nirācāro nāham asmīti bhāvayan

— शूल को समरस करके ; — रस में रस के समान स्थित ; — शङ्का को त्यागकर ; — निराचार (आचार-रहित) ; — 'मैं (परिमित अहं) नहीं हूँ' ऐसा भावित करता हुआ

शूल को समरस करके, रस में रस के समान स्थित (होकर), शङ्का को त्यागकर, निराचार (आचार-रहित) होकर, 'मैं (परिमित अहं) नहीं हूँ' — ऐसा भावित करता हुआ,