The Essence of the Tantra· 22.45 / 53

The Essence of the Tantra22.45

22.45

देहस्था देवताः पश्यन् ह्लादोद्वेगादि चिद्धने । कर्णाक्षिमुखनासादिचक्रस्थं देवतागणम्

Transliteration (IAST)

dehasthā devatāḥ paśyan hlādodvegādi ciddhane | karṇākṣimukhanāsādicakrasthaṃ devatāgaṇam

— देह में स्थित देवताओं को देखता हुआ ; — ह्लाद, उद्वेग आदि ; — चिद्-घन में ; — कर्ण, अक्षि, मुख, नासा आदि चक्रों में स्थित ; — देवता-गण को

देह में स्थित देवताओं को देखता हुआ, चिद्-घन में ह्लाद, उद्वेग आदि को (देखता हुआ), कर्ण, अक्षि, मुख, नासा आदि चक्रों में स्थित देवता-गण को —