The Essence of the Tantra· 22.39 / 53

The Essence of the Tantra22.39

22.39

अव्युच्छिन्नानाहतपरमार्थैर् मन्त्रवीर्यं तत् । गमनागमविश्रान्तिषु कर्णे नयने द्विलक्ष्यसम्पर्के

Transliteration (IAST)

avyucchinnānāhataparamārthair mantravīryaṃ tat | gamanāgamaviśrāntiṣu karṇe nayane dvilakṣyasamparke

— अव्युच्छिन्न (अखण्ड) ; — अनाहत (अनहत) परमार्थों के द्वारा ; — वह मन्त्र-वीर्य (है) ; — गमन, आगमन एवं विश्रान्ति (प्राण-गति) में ; — कर्ण एवं नयन में ; — दो लक्ष्यों के सम्पर्क में

अव्युच्छिन्न (अखण्ड) अनाहत (अनहत) परमार्थों के द्वारा वह मन्त्र-वीर्य (है) — गमन, आगमन एवं विश्रान्ति (प्राण की गति-आगति-विश्राम) में, कर्ण एवं नयन में, दो लक्ष्यों के सम्पर्क में,