The Essence of the Tantra· 22.40 / 53

The Essence of the Tantra22.40

22.40

तत्सम्मीलनयोगे देहान्ताख्ये च यामले चक्रे । कुचमध्यहृदयदेशाद् ओष्ठान्ते कण्ठगं यद् अव्यक्तम्

Transliteration (IAST)

tatsammīlanayoge dehāntākhye ca yāmale cakre | kucamadhyahṛdayadeśād oṣṭhānte kaṇṭhagaṃ yad avyaktam

— उनके सम्मीलन (मिलन) के योग में ; — 'देहान्त' नामक यामल चक्र में ; — कुच (स्तन) के मध्य हृदय-प्रदेश से ; — ओष्ठ-पर्यन्त, कण्ठ तक पहुँचने वाला ; — जो अव्यक्त (ध्वनि)

उनके सम्मीलन (मिलन) के योग में, 'देहान्त' नामक यामल चक्र में, कुच (स्तन) के मध्य हृदय-प्रदेश से ओष्ठ-पर्यन्त, कण्ठ तक पहुँचने वाला जो अव्यक्त (ध्वनि है) —