The Essence of the Tantra· 22.41 / 53

The Essence of the Tantra22.41

22.41

तच् चक्रद्वयमध्यगम् आकर्ण्य क्षोभविगमसमये यत् । निर्वान्ति तत्र चैवं यो ऽष्टविधो नादभैरवः परमः

Transliteration (IAST)

tac cakradvayamadhyagam ākarṇya kṣobhavigamasamaye yat | nirvānti tatra caivaṃ yo 'ṣṭavidho nādabhairavaḥ paramaḥ

— उस दोनों चक्रों के मध्य में स्थित (ध्वनि) को ; — सुनकर, श्रवण करके ; — क्षोभ के विगम (शान्ति) के समय ; — (जो ध्वनियाँ वहाँ) निर्वाण को प्राप्त होती हैं ; — जो अष्टविध परम नाद-भैरव

उस दोनों चक्रों के मध्य में स्थित (ध्वनि) को सुनकर, क्षोभ के विगम (शान्ति) के समय जो (ध्वनियाँ) वहाँ निर्वाण को प्राप्त होती हैं — इस प्रकार जो अष्टविध परम नाद-भैरव है,