The Essence of the Tantra· 22.38 / 53

The Essence of the Tantra22.38

22.38

पानोपभोगलीलाहासादिषु यो भवेद् विमर्शमयः । अव्यक्तध्वनिरावस्फोटश्रुतिनादनादान्तैः

Transliteration (IAST)

pānopabhogalīlāhāsādiṣu yo bhaved vimarśamayaḥ | avyaktadhvanirāvasphoṭaśrutinādanādāntaiḥ

— पान, उपभोग, लीला, हास आदि में ; — जो विमर्शमय (अंश) हो ; — अव्यक्त ध्वनि ; — राव, स्फोट, श्रुति, नाद, नादान्त (स्तरों) के द्वारा

पान, उपभोग, लीला, हास आदि में जो विमर्शमय (अंश) हो — अव्यक्त ध्वनि, राव, स्फोट, श्रुति, नाद, नादान्त (इन स्तरों) के द्वारा,