The Essence of the Tantra· 22.37 / 53

The Essence of the Tantra22.37

22.37

सृष्ट्यादिक्रमम् अन्तः कुर्वंस् तुर्ये स्थितिं लभते । एतत् खेचरमुद्रावेशे ऽन्योन्यं स्वशक्तिशक्तिमतोः

Transliteration (IAST)

sṛṣṭyādikramam antaḥ kurvaṃs turye sthitiṃ labhate | etat khecaramudrāveśe 'nyonyaṃ svaśaktiśaktimatoḥ

— सृष्टि आदि क्रम को ; — भीतर सम्पादित करता हुआ ; — तुर्य में स्थिति प्राप्त करता है ; — खेचरी-मुद्रा-आवेश में ; — परस्पर, अपनी शक्ति एवं शक्तिमान् का

सृष्टि आदि क्रम को भीतर सम्पादित करता हुआ (साधक) तुर्य में स्थिति प्राप्त करता है। यह अपनी शक्ति एवं शक्तिमान् के परस्पर खेचरी-मुद्रा-आवेश में (होता है)।