The Essence of the Tantra· 22.36 / 53

The Essence of the Tantra22.36

22.36

त्रिदलारुणवीर्यकलासङ्गान् मध्ये ऽङ्कुरसृष्टिः । इति शशधरवासरपतिचित्रगुषङ्घट्टमुद्रया झटिति

Transliteration (IAST)

tridalāruṇavīryakalāsaṅgān madhye 'ṅkurasṛṣṭiḥ | iti śaśadharavāsarapaticitraguṣaṅghaṭṭamudrayā jhaṭiti

— तीन दलों के अरुण (रक्त) वीर्य-कला के सङ्ग से ; — मध्य में अङ्कुर की सृष्टि ; — शशधर (चन्द्र) एवं वासर-पति (सूर्य) ; — विचित्र संयोग-घट्टन-मुद्रा से ; — तत्क्षण

तीन दलों के अरुण (रक्त) वीर्य-कला के सङ्ग से मध्य में अङ्कुर की सृष्टि (होती है)। इस प्रकार शशधर (चन्द्र) एवं वासर-पति (सूर्य) की विचित्र संयोग-घट्टन-मुद्रा से तत्क्षण (यह होता है)।