The Essence of the Tantra· 20.9 / 65

The Essence of the Tantra20.9

20.9

तत्र हृद्ये स्थण्डिले विमलमकुरवद् ध्याते स्वम् एव रूपं याज्यदेवताचक्राभिन्नं मूर्तिबिम्बितम् इव दृष्ट्वा हृद्यपुष्पगन्धासवतर्पणनैवेद्यधूपदीपोपहारस्तुतिगीतवाद्यनृत्तादिना पूजयेत् जपेत् स्तुवीत तन्मयीभावम् अशङ्कितं लब्धुम्

Transliteration (IAST)

tatra hṛdye sthaṇḍile vimalamakuravad dhyāte svam eva rūpaṃ yājyadevatācakrābhinnaṃ mūrtibimbitam iva dṛṣṭvā hṛdyapuṣpagandhāsavatarpaṇanaivedyadhūpadīpopahārastutigītavādyanṛttādinā pūjayet japet stuvīta tanmayībhāvam aśaṅkitaṃ labdhum

— हृदय-रूप स्थण्डिल पर ; — विमल दर्पण के समान ध्यान करने पर ; — अपना ही रूप ; — याज्य-देवता-चक्र से अभिन्न ; — मूर्ति में बिम्बित-सा देखकर ; — हृद्य पुष्प, गन्ध, आसव, तर्पण, नैवेद्य, धूप, दीप, उपहार, स्तुति, गीत, वाद्य, नृत्त आदि से ; — पूजे, जपे, स्तुति करे ; — अशंकित तन्मयी-भाव प्राप्त करने के लिए

वहाँ हृदय-रूप स्थण्डिल को विमल दर्पण के समान ध्यान करने पर, अपने ही रूप को — याज्य-देवता-चक्र से अभिन्न — मूर्ति में बिम्बित-सा देखकर, हृद्य (मनोहर) पुष्प, गन्ध, आसव, तर्पण, नैवेद्य, धूप, दीप, उपहार, स्तुति, गीत, वाद्य, नृत्त आदि से पूजे, जपे, स्तुति करे — अशंकित तन्मयी-भाव प्राप्त करने के लिए।