The Essence of the Tantra· 20.10 / 65

The Essence of the Tantra20.10

20.10

आदर्शे हि स्वमुखम् अविरतम् अवलोकयतः तत्स्वरूपनिश्चितिः अचिरेणैव भवेत् न चात्र कश्चित् क्रमः प्रधानम् ऋते तन्मयीभावात्

Transliteration (IAST)

ādarśe hi svamukham aviratam avalokayataḥ tatsvarūpaniścitiḥ acireṇaiva bhavet na cātra kaścit kramaḥ pradhānam ṛte tanmayībhāvāt

— दर्पण में ; — अपने मुख को अविरत देखने वाले को ; — उसके स्वरूप का निश्चय ; — शीघ्र ही हो जाता है ; — और यहाँ कोई क्रम प्रधान नहीं ; — तन्मयी-भाव के अतिरिक्त

क्योंकि दर्पण में अपने मुख को अविरत देखने वाले को उसके स्वरूप का निश्चय शीघ्र ही हो जाता है; और यहाँ तन्मयी-भाव के अतिरिक्त कोई क्रम प्रधान नहीं।