The Essence of the Tantra· 20.11 / 65

The Essence of the Tantra20.11

20.11

परमन्त्रतन्मयीभावाविष्टस्य निवृत्तपशुवासनाकलङ्कस्य भक्तिरसानुवेधविद्रुतसमस्तपाशजालस्य यत् अधिवसति हृदयं तद् एव परमम् उपादेयम् इति अस्मद्गुरवः

Transliteration (IAST)

paramantratanmayībhāvāviṣṭasya nivṛttapaśuvāsanākalaṅkasya bhaktirasānuvedhavidrutasamastapāśajālasya yat adhivasati hṛdayaṃ tad eva paramam upādeyam iti asmadguravaḥ

— पर-मन्त्र-तन्मयी-भाव से आविष्ट ; — जिसका पशु-वासना का कलंक निवृत्त हो गया ; — जिसका समस्त पाश-जाल भक्ति-रस के अनुवेध से विद्रुत (पिघल गया) ; — जो हृदय (उसमें) अधिवसित होता है ; — वही परम उपादेय ; — हमारे गुरु (कहते हैं)

पर-मन्त्र-तन्मयी-भाव से आविष्ट, जिसका पशु-वासना का कलंक निवृत्त हो गया, जिसका समस्त पाश-जाल भक्ति-रस के अनुवेध से विद्रुत (पिघल गया) — उसमें जो हृदय अधिवसित होता है, वही परम उपादेय है — ऐसा हमारे गुरु (कहते हैं)।